US Election 2024 Result: स्वामी विवेकानन्द, राष्ट्रपति चुनाव और अमेरिकी हिन्दू :- रंगनाथ सिंह

US Election 2024 Result: कल रात देर हो गयी थी इसलिए बस सूत्र वाक्य लिखकर चला गया। कई लोगों को हिन्दू प्राइड की व्हाइट हाउस में एंट्री की बात मजाक लगी। जिन्हें ऐसा लगा हो, उन्हें स्पष्ट कर दूँ कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।

मेरे ख्याल से डोनाल्ड ट्रम्प शायद पहले अमेरिका राष्ट्रपति होंगे जिन्होंने हिन्दू समुदाय का नाम लेकर उससे वोट माँगा होगा। वह 2016 से ही हिन्दू समुदाय को सीधे अपील करते रहे हैं। जिस तरह भारत के रूलिंग इलीट को लगता है कि “हिन्दू धार्मिक भावना” जैसी कोई चीज नहीं होती, उसी तरह अमेरिकी रूलिंग इलीट को भी यही लगता है। डेमोक्रेट नेता महात्मा गांधी की जय या ‘आई लव हनुमाना’ बोलकर अमेरिकी हिन्दू वोटरों को संकेत देते रहे हैं मगर ट्रम्प ने सीधे नाम लेकर हिन्दुओं से संवाद स्थापित किया। जॉन एलिया को याद कीजिए,

शर्म दहशत झिझक परेशानी, नाज़ से काम क्यूँ नहीं लेतीं।

आप वो जी मगर ये सब क्या है, तुम मिरा नाम क्यूँ नहीं लेतीं।

बांग्लादेश में हिन्दुओं के संग तीन महीने से हो रही सुनियोजित हिंसा के खिलाफ भी नाम लेकर केवल ट्रम्प ने बोला और मतदान से ठीक पहले बोला जिसका असर अमेरिका से लेकर भारत तक देखने को मिला।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में कई चीजें पहली बार हुई है

चुनाव से पहले डेमोक्रेट उप-राष्ट्रपति उम्मीदवार टिम वाल्ज एक हिन्दू मंदिर में दर्शन करने गये थे। इण्डिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार ऐसा पहली बार हुआ था कि डेमोक्रेट उप-राष्ट्रपति उम्मीदवार को मन्दिर जाकर दर्शन करना पड़ा। इस तरह के अमेरिकी चुनाव के कई अन्य प्रथम गिनाये जा सकते हैं जिनका सीधा सम्बन्ध हिन्दू पहचान से है।

माना जाता है कि स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं।” कल मैंने सोच-समझकर ही उस जुमले का प्रयोग किया था। स्वामी विवेकानन्द द्वारा अमेरिका के शिकागो धर्म-सम्मेलन में दिया गया वक्तव्य धर्म-इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। आप कह सकते हैं कि सैन्य विजय को धर्म-विजय की तरह प्रस्तुत करने के कुटैव के खिलाफ पहली बार किसी ने अमेरिका में खड़े होकर प्रतिवाद किया और यह दिखाया कि हिन्दू धर्म किसी अन्य धर्म से कम नहीं है। आप कह सकते हैं कि विवेकानन्द ने अमेरिका में ‘हिन्दू प्राइड’ की तब बहाली की जब वह सैन्य शक्ति विहीन था।

हिन्दी प्रबुद्ध वर्ग के लिए ‘हिन्दू प्राइड’ अछूत जुमला

जाहिर सी बात है कि हिन्दी प्रबुद्ध वर्ग में ‘हिन्दू प्राइड’ अछूत जुमला है। इसका प्रयोग करते ही आपको रौरव नर्क का भागी बनना पड़ सकता है। मगर भारत के बाहर ‘हिन्दू प्राइड’ अछूत नहीं रहा। भारत से बाहर हिन्दू का मूल्यांकन हिन्दुओं के बारे में तैयार किये गये कोलोनियल साहित्य के आधार पर नहीं किया जा रहा है बल्कि उनकी लिविंग रियल्टी के आधार पर उनका मूल्य तय किया जा रहा है। हिन्दू समुदाय ने ईसाई-बहुल देश में रहकर दिखाया है कि वह वैसा नहीं है जैसा कोलोनियल मिशनरी साहित्य में उसे बताया जाता रहा है।

अमेरिका-ब्रिटेन इत्यादि में हिन्दू समुदाय ने ऑन-रिकॉर्ड प्रूफ कर दिया है कि वह उस देश का सबसे शिक्षित और सम्पन्न प्रवासी समुदाय है। इसके अलावा स्थानीय कानून का सम्मान करने और स्थानीय सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करने में भी वह सर्वोपरि है। अमेरिका-ब्रिटेन में प्रवासी हिन्दू समुदाय की तुलना यहूदी समुदाय से होने लगी है क्योंकि कई पैरामीटर पर उसने यहूदी समुदाय की बराबरी कर ली है।

भारतीय हिन्दू समाज का तेजी से हो रहा है यहूदीकरण

मैंने कुछ समय पहले भी अलग सन्दर्भ में लिखा था कि भारतीय हिन्दू समाज का तेजी से यहूदीकरण हो रहा है। अमेरिका चुनाव में केवल हिन्दू समुदाय डेमोक्रेट से रिपब्लिकन की तरफ शिफ्ट नहीं हुआ बल्कि यहूदी समुदाय भी डेमोक्रेट से रिपब्लिकन की तरफ शिफ्ट हुआ है। उसकी वजह है, पिछले साल अक्टूबर में हुए हमले के बाद अमेरिका के अन्दर मौजूद एंटी-यहूदी नेटवर्क का खुलकर सामने आ जाना। अमेरिका की हर दूसरी-तीसरी ईंट पर यहूदी लिखा मिलेगा मगर डेमोक्रेट यहूदियों को अहसास न था कि उनके “दूसरे घर” में एंटी-सेमेटिज्म की कितनी गहरी पैठ हो चुकी है।

हिन्दुओं पर एक कोलोनियल लांछन ये रहा है कि वे धर्म के नाम पर ‘एकजुट’ नहीं हो सकते। विवेकानन्द से याद आया कि विवेकानन्द जयंती पर कई आस्थाविहीन हिन्दू उनका वह उद्धरण शेयर करना पसन्द करते हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि हिन्दू धर्म को “इस्लाम की देह और वेदान्त की आत्मा” चाहिए। जाहिर है कि यह कोटेशन ज्यादातर वे लोग शेयर करते हैं जिन्हें यह दिखाना होता है कि वे “सेकुलर” हैं। कुछ लोग यह दिखाने के लिए इसका प्रयोग करते हैं कि इस्लाम कितना अच्छा है कि विवेकानन्द जैसा सन्त भी उसके जैसी देह की कामना कर रहा है! पत्रकारिता के एक मशहूर प्रोफेसर ने भी कुछ समय साल पहले विवेकानन्द का वह उद्धरण शेयर किया तो एक मित्र ने मुझसे पूछा कि क्या विवेकानन्द से सचमुच वैसा कहा था!

मेरे मित्र भी सेकुलर हैं तो मैं समझ रहा था कि वह मुझे सन्देश देने के लिए सवाल पूछ रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि मेरे विचार में भी विवेकानन्द ने ऐसा कहा है मगर उनका जो अर्थ है, वह प्रोफेसर साहब के पल्ले पड़ा होता तो वह इस कोटेशन को कभी शेयर नहीं करते। वह चौंके! बोले मतलब!

मैंने कहा, विवेकानन्द जिस देह की बात कर रहे हैं वह क्या है! वह देह है, धार्मिक पहचान को हर पहचान के ऊपर तरजीह देने वाली सोच! प्रोफेसर साहब, सेकुलरिज्म-सेकुलरिज्म खेल रहे हैं मगर जिस दिन सचमुच हिन्दू धर्म की देह इस्लाम जैसी हो गयी, उस दिन उन्हें दिन में तारे नजर आने लगेंगे!

उन प्रोफेसर साहब को तारे तो नहीं मगर बीते लोकसभा चुनाव के बाद हरे-भरे प्राकृतिक नजारे जरूर नजर आने लगे! आप कह सकते हैं कि अमेरिका में विवेकनान्द की चाहना पूरी होने की तरफ बढ़ चुकी है। अमेरिकी हिन्दू धार्मिक पहचान के नाम पर एकजुट होना सीख चुके हैं। अमेरिकी लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा 51 प्रतिशत नाम 49 प्रतिशत पर टिकी है। जो 51 प्रतिशत अपने पक्ष में जुटा लेगा, वह अगले चार साल देश पर राज करेगा।

अमेरिका और भारत इत्यादि में सेना की कमान किसके हाथ में होगी, यह असैनिक जनता तय करती है

हो सकता है कि कोई बुकर विजेता आपको यह भ्रम देना चाहे कि ऐसा शासन देश की 49 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व नहीं करता! यह बहुसंख्यकवाद है! जिस तरह जादूगर आपके आँखों की प्राकृतिक सीमा का इस्तेमाल करके जादू दिखाते हैं, उसी तरह वकील रूपी बुद्धिजीवी भी डेटा को इस तरह नचाते हैं कि आपकी आँखों के सामने से सच ओझल हो जाए। ऐसे में आप याद रखिएगा कि लोकतंत्र के आविर्भाव से पहले पूरी दुनिया में किसी भी इलाके पर बमुश्किल 2-5 प्रतिशत आबादी का कब्जा हुआ करता था।

जिस इलाके में जो सेना जीत गयी, वह उस इलाके के सामान्य नागरिकों की माई-बाप बन जाती थी। आप मान सकते हैं कि असैनिक जनता का सबसे बड़ा सहारा लोकतंत्र है। चीन, उत्तर कोरिया, सऊदी अरब, कतर, अफगानिस्तान, पाकिस्तान में उसी के पास सत्ता है जिसका सेना पर नियंत्रण है। अमेरिका और भारत इत्यादि में सेना की कमान किसके हाथ में होगी, यह असैनिक जनता तय करती है।

चूँकि अमेरिका में सत्ता का निर्धारण 51:49 के सूत्र से होता है इसलिए वहाँ 1.1 प्रतिशत वोट का भी बहुत महत्व है। अमेरिका में वहाँ की आबादी के करीब एक प्रतिशत हिन्दू हैं और 2.5 प्रतिशत यहूदी हैं। हिन्दू-यहूदी भाई-भाई की साझा शक्ति के आगे डेमोक्रेट परास्त हो चुके हैं। यदि आपने वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता के दि प्रिंट का अमेरिकी चुनाव पर 50 वर्ड सम्पादकीय पढ़ा न हो तो उसकी दो पँक्तियाँ अब पढ़ लीजिए,

“Trump’s definitive victory isn’t just about gender and race. It’s a vote against elitist political correctness, immigration anxiety and political Islam.”

न्यूयार्क टाइम्स ने भी ट्रम्प की जीत को Populist Vs Elit के रूप में देखा है। मगर NYT वालों ने जॉन एलिया को नहीं पढ़ा होगा इसलिए वे नाम न ले सके मगर दि प्रिंट ने “पोलिटिकल इस्लाम” का नाम लेने का साहस किया है। अब आपको यह पढ़कर अच्छा लगे या बुरा, मगर मेरे ख्याल से भी हुआ यही है।

आजकल ज्यादातर लोग लेखक-पत्रकार को पढ़कर उसकी बातों पर विचार नहीं करते बल्कि न्यायाधीश बनकर उसकी पीठ पर लेबल चिपकाने को बौद्धिकता समझने लगते हैं। प्रतिक्रियावादी बनने से बेहतर है कि प्रस्तुत विचारों और तथ्यों पर विचार कीजिए। आपको पसन्द हो या न हो, इस चुनाव में अमेरिकी हिन्दू समुदाय ने निर्णायक रूप से खुद को वोटबैंक के रूप में स्थापित कर लिया है। इसीलिए मैंने कहा कि “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं” कि यह अमेरिकी श्वेत-भवन में पहली आधिकारिक एंट्री है।

यह भी पढ़ें: Hindu temple attacked in Canada: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कनाडा में हिंदू मंदिर पर हमले की कड़ी निंदा

आलेख: यह आलेख वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रंगनाथ सिंह जी के फेसबुक वाल से लिया गया है

नोट: यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। यह ज़रूरी नहीं है कि खबरीलाल लाइव इससे सहमत हो।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *