यदि निर्वाचित जनप्रतिनिधि चुनाव प्रचार के समान ही उत्साह अपने कार्यकाल में दिखाएँ, तो न सिर्फ बिहार बदलेगा, बल्कि राजनीति की परिभाषा भी।!~✍️ अमित रोहित
जब बिहार में चुनाव का बिगुल बजता है, तो एक अलग ही माहौल बन जाता है। पोस्टरों की बाढ़, सोशल मीडिया पर वीडियो, घर-घर पहुंचते हुए वादे — राजनीतिज्ञ और दल इससे कम कुछ भी करने को तैयार नहीं दिखते। यह चुनावी महासमर इतना ऊर्जावान और मेहनत से भरा होता है कि कई बार लगता है, मानो सबकुछ बिहार बदल देने के लिए ही किया जा रहा हो। परंतु, यह विडंबना ही है कि जीत मिलते ही यह गति, यह जुनून और यह तन्मयता काफी हद तक धूमिल हो जाती है।
जितनी ऊर्जा और संसाधन चुनाव जीतने में निवेश किए जाते हैं, उतना निवेश काम करने में क्यों नहीं किया जाता?
बिहार विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों ने जहाँ एक तरफ सोशल मीडिया से लेकर गांव-गली तक सघन प्रचार किया, वहीं उनके खर्च का आंकड़ा भी इसका प्रमाण है। कुछ उम्मीदवारों ने ~₹20 लाख से अधिक का चुनावी खर्च दिखाया। राजनीतिक दलों ने सिर्फ डिजिटल प्रचार पर ही ₹4.8 करोड़ से ज्यादा खर्च किए। इसके अलावा, चुनाव से पहले घोषित कल्याणकारी योजनाओं का कुल खर्च ₹3,200 करोड़ तक जा पहुँचा, जो किसी भी राज्य के लिए बड़ी राशि है।
पर सवाल यह है कि जितनी ऊर्जा और संसाधन चुनाव जीतने में निवेश किए जाते हैं, उतना निवेश काम करने में क्यों नहीं किया जाता? क्यों जनता को अपने विधायक महीनों बाद ही उपलब्ध होते हैं? क्यों घोषणाएँ तो ताबड़तोड़ होती हैं, पर प्रक्रियाएँ सुस्त हो जाती हैं? सवाल सीधा-सा है: यदि विधायक और सरकार चुनाव जीतने के बाद उसी उत्साह से काम करें, तो न सिर्फ जनता का जीवन सुधरेगा, बल्कि अगला चुनाव प्रचार भी अपेक्षाकृत आसान होगा। क्योंकि तब काम खुद बोलेगा।
सर्वेक्षण, प्रदर्शन रिपोर्ट और नागरिक अनुभव, सभी यह संकेत देते हैं कि हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों का प्रदर्शन उस स्तर पर नहीं है जैसा प्रचार के दौरान दिखाया जाता है। उदाहरण के तौर पर बिहार विधानसभा (2020-25) के दौरान कई विधायकों की सदन में उपस्थिति और क्षेत्रीय कार्य, अपेक्षाकृत कम पाए गए हैं। जनता यह फर्क महसूस करती है।
अब प्रश्न यह है कि क्या इसका कोई समाधान है? क्या ऐसी व्यवस्था बनी रह सकती है जहाँ चुनावी मेहनत सिर्फ चुनाव तक सीमित न रहकर, पूरे कार्यकाल में जनता की सेवा में लगे? उत्तर स्पष्ट है: हाँ, यह संभव है — यदि विधायक इसे व्यक्तिगत प्रतिबद्धता के रूप में अपनाएँ। यहाँ कुछ सुझाव हैं:
पहले 100 दिन की योजना
विधायक अपने कार्यकाल के पहले 100 दिनों में अपने क्षेत्र में नियमित जनसुनवाई, समस्याओं की सूची और प्राथमिकता तय करें। मंथली मिलन दिवस: हर महीने तय दिन पर जनता से सीधे मुलाकात का आयोजन करें। पारदर्शिता और रिपोर्टिंग: हर छह महीने में अपना रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक करें — किस योजना का क्या हाल है, कितना बजट उपयोग हुआ, किन समस्याओं का समाधान हुआ।
प्रचार कार्य = काम का विस्तार:
प्रचार केवल वादों का नहीं, काम का होना चाहिए। अगले चुनाव में नई घोषणाओं से अधिक, पिछले काम की कहानी सुनी जाए। यह सिर्फ बिहार के लिए ही नहीं, पूरे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अपेक्षित सुधार है। प्रचार के दौरान जो ऊर्जा और सूक्ष्म रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं, यदि वैसी ही संरचना और फॉलो-अप जनता के बीच लागू हो, तो राजनीति का उद्देश्य व्यावहारिक जनसेवा बन सकता है।
निष्कर्षतः
बिहार के प्रतिनिधियों को यह आत्ममंथन करना चाहिए: क्या वे चुनाव लड़ने और जीतने में जो जोश दिखाते हैं, उसी जोश से बिहार को बदलने में भी लगे हुए हैं? यदि हाँ, तो उन्हें अगले चुनाव की चिंता कम होगी, क्योंकि जनता स्वयं उनके पक्ष में बोलेगी। यदि नहीं, तो प्रश्न बार-बार खड़ा होगा, चुनाव में जनता की सेवा का वादा किया, पर कार्यकाल में उसे निभाया कितना?
यह संपादकीय किसी दल-विशेष के लिए नहीं, बल्कि उन सभी जनप्रतिनिधियों के लिए है जो जनता के विश्वास को जीतकर सत्ता में आते हैं। और यही विश्वास हमें निरंतर बनाए रखना होगा, तभी लोकतंत्र भी मजबूत होगा और बिहार भी।
इस संपादकीय के लेखक अमित रोहित हैं। इस लेख में व्यक्त विचार पूर्णतः लेखक के व्यक्तिगत मत हैं। लेखक वर्तमान में माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के बेंगलुरु कार्यालय में कार्यरत हैं।
